15 Short Moral Stories in Hindi | Download PDF

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Short Moral Stories in Hindi बच्चों को जीवन का पाठ पढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि बच्चों को अगर कोई बात सीधे बताई जाए तो उन्हें पसंद नहीं आता है। लेकिन वही बात अगर उन्हें कहानियों के माध्यम से बताई जाए तो, वह बात उनके दिमाग में बैठ जाती है और वे उसका अनुशरण भी करते हैं।

इस पोस्ट में 15 चुनिंदा Short Moral Stories Hindi को संकलित किया गया है । इन्हें दोस्तों और सोशल मीडिया पर शेयर करें।

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सफलता का रहस्य- Short Moral Stories in Hindi

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एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता  का रहस्य क्या है?

सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनार मिलो। अगले दन वो नदी के किनारे मिले। सुकरात

ने नौजवान को उनके साथ नद की तरफ बढ़ने को कहा, और जब आगे बढ़ते-बढ़ते नदी का पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया। लड़का बाहर निकलने के लिये संघर्ष करने लगा, लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते जल्दी-जल्दी साँस लेनी शुरु कर दिया।

सुकरात ने पूछा ,” जब तुम वहाँ पानी में थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाह रहे थे?”

लड़के ने उत्तर दिया,”साँस लेना”

सुकरात ने कहा, ”यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी बुरी तरह से चाहोगे जितना कि तुम साँस लेना चाहते थे तो वो तुम्हे अवश्य मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है।

तेनीलीराम - Short Moral Stories in Hindi

एक बार तेनालीराम का कुत्ता बीमार पड़ गया और बीमारी के कारण एक दिन चल बसा। कुत्ते के मर जाने के बाद तेनालीराम स्वयं बीमार पड़ गया। उसे बहुत तेज बुखार ने घेर लिया।

एक पंडित जी उसके घर पर आकर बोले:-” तुम्हें अपने पाप का प्रायश्चित करना चाहिए|हो सकता है तुम्हारे पापों की वजह से तुम्हें इस रोग से छुटकारा ना मिले।” तेनालीराम ने पूछा:-” मुझे क्या करना होगा?”

पंडित जी ने उत्तर दिया:-” तुम्हारे लिए पूजा पाठ करना पड़ेगा तथा इसमें तुम्हें 100 स्वर्ण मुद्राएं खर्च करनी पड़ेगी।”

तेनालीराम बोला:-” लेकिन पंडित जी इतनी सारी स्वर्ण मुद्राएं मैं कहां से लाऊंगा?”

पंडित जी बोले:-” तुम्हारे पास जो घोड़ा है उसे बेच देना तथा उससे जो रकम तुम्हें मिलेगी वह मुझे दान में दे देना।”

तेनालीराम ने पंडित जी की बात स्वीकार कर ली। पंडित जी ने पूजा पाठ करके तेनालीराम को शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। कुछ ही दिनों में तेनालीराम वैध जी की दवाइयों से ठीक हो गया।

तेनालीराम पंडित जी को साथ लेकर बाजार में गया। उसने एक हाथ से घोड़े की लगाम पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से एक टोकरी।

बाजार में पहुंचकर तेनालीराम ने जोर से आवाज लगाई:-” यह घोड़ा बिकाऊ है। घोड़े का मूल्य एक आना है तथा इसके साथ एक टोकरी भी है, जिसका मूल्य 100 स्वर्ण मुद्राएं हैं। जो सज्जन लेना चाहे उसे घोड़ा एवं टोकरी दोनों ही लेनी पड़ेगी।”

एक व्यक्ति ने दोनों चीजें खरीद ली तथा तेनालीराम को एक आना एवं 100 स्वर्ण मुद्राएं देकर घोड़ा एवं टोकरी को खरीद लिया। तेनालीराम ने पंडित जी को एक आना दे दिया तथा 100 स्वर्ण मुद्राएं स्वयं रख ली।

पंडित जी ने कहा:-” तेनालीराम! तुम मेरे साथ अन्याय कर रहे हो। तुम मुझे 100 स्वर्ण मुद्राएं देने की बजाय 1 आना दे रहे हो।”

तेनालीराम बोला:-” पंडित जी! आपने ही कहा था कि जो तुम्हारे पास घोड़ा है, उसे बेच कर जो रकम मिलेगी वह मुझे दान में दे देना। घोड़े की कीमत एक आना थी और टोकरी की कीमत 100 स्वर्ण मुद्राएं।

तेनालीराम की यह बात सुनकर पंडित जी को अपनी बात पर बड़ा ही अफसोस हुआ और वह एक आना लेकर चल दिए।

सीख- जैसे को तैसा ही उचित रहता है।

मित्रता - Moral Story

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एक जंगल में झील किनारे कछुआ, कठफोड़वा व हिरण मित्र भाव से रहते थे। एक दिन एक शिकारी ने उनके पैरों के निशान देखकर उनके रास्तेवाले पेड़ से एक फंदा लटका दिया और अपनी झोंपड़ी में चला गया। थोड़ी ही देर बाद हिरण मस्ती में झूमता हुआ उधर ने निकला और फंदे में फंस गया।

‘बचाओ- बचाओ’ वह जोर से चिल्लाया।

उसकी पुकार सुनकर कठफोड़वा के साथ कछुआ आ गया। कठफोड़वा बोला, ‘मित्र तुम्हारे दांत मजबूत हैं। तुम इस फंदे को काटो। मैं शिकारी का रास्ता रोकता हूं।‘

कछुआ फंदा काटने में लग गया। उधर कठफोड़वा शिकारी की झोपड़ी की तरफ उड़ चला और मानस बनाया कि जैसे ही शिकारी झोपड़ी से बाहर निकलेगा, वह उसे चोंच मारकर लहूलुहान कर देगा।

उधर शिकारी ने भी जैसे ही हिरण की चीख सुनी तो उसने समझ लिया कि वह फंदे में फंस चुका है। वह तुंरत झोंपड़ी से बाहर निकला और पेड़ की ओर लपका।

लेकिन कठफोड़वे ने उसके सिर पर चोंच मारनी शुरू कर दी। शिकारी अपनी जान बचाकर फिर झोंपड़ी में भागा और झोंपड़ी के पिछवाड़े से निकलकर पेड़ की ओर बढ़ा।

कठफोड़वा उससे पहले ही पेड़ के पास पहुंच गया। उसने देखा कि कछुआ अपना काम कर चुका था। उसने हिरण और कछुए से कहा, ‘मित्रो, जल्दी से भागो। शिकारी आने ही वाला होगा।‘

यह सुनकर हिरण वहां से भाग निकला। लेकिन कछुआ शिकारी के हाथ लग गया। शिकारी ने कछुए को थैले में डाल लिया, और बोला ‘इसकी वजह से हिरण मेरे हाथ से निकल गया। आज इसको ही मारकर खाऊंगा।‘

उधर हिरण ने सोचा उसका मित्र पकड़ा गया है। उसने मेरी जान बचाई थी, अब मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं उसकी मदद करूं। यह सोचकर वह शिकारी के रास्ते में आ गया।

शिकारी ने हिरण को देखा तो थैले को वहीं फेंककर वह हिरण के पीछे भागा। हिरण अपनी पुरानी खोह की ओर भाग छूटा। शिकारी उसके पीछे-पीछे था। भागते-भागते हिरण अपनी खोह में घुस गया। उसने सोचा एक बार शिकारी इस खोह में घुस गया तो उसका बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा।

थोड़ी ही देर में शिकारी खोह के पास पहुंचा। उसने सोचा अब हिरण भागकर कहां जाएगा। अब तो वह फंस ही गया है और वह भी खोह के अंदर घुस गया। खोह के अंदर भुल-भुलैयावाला रास्ता था। शिकारी उन रास्तों में फंस गया।

हिरण दूसरे रास्ते से निकलकर थैले के पास जा पहुंचा और कछुए को आजाद कर दिया। उसके बाद वे तीनों मित्र वहां से सही-सलामत निकल गए।

सीख: सच्चा मित्र वही होता है जो मुसीबत के समय काम आता है।

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शब्द और पंख

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एक बार एक किसान ने अपने पड़ोसी को बहुत बुरा भला कह दिया। लेकिन बाद में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ वो पश्चाताप के लिए एक संत के पास गया। उसने जाकर संत से अपने शब्द वापिस लेने का उपाय पूछा ताकि उसके मन का बोझ कुछ कम हो सके।

संत ने किसान से कहा एक काम करो तुम जाकर कही से खूब सारे पंख इक्काठा कर लो और उसके बाद उन पंखों को शहर के बीचो बीच बिखेर दो।


किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंचा गया। तो संत ने उस किसान से कहा – क्या तुम ऐसा कर सकते हो कि जाकर उन पंखों को पुनः समेट के ले आ सको। इस पर किसान वापिस गया तो देखता है कि हवा के कारण सारे पंख उड़ गये है और कुछ जो बचे है वो समेटे नहीं जा सकते।


किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा तो संत ने उसे समझाया कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे शब्दों के साथ होता है। तुम बड़ी आसानी से किसी को कुछ भी बिना सोचे समझे कह सकते हो लेकिन एक बार कह देने के बाद वो शब्द वापिस नहीं लिए जा सकते। ठीक ऐसे ही जैसे एक बार बिखेर देने के बाद पंखों को वापिस नहीं समेटा जा सकता। तुम चाह कर भी उन शब्दों को वापिस नहीं ले सकते, इसलिए आज के बाद कभी भी किसी से कुछ कहने से पहले विचार कर बोलना।

हाथी और रस्सी

एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बधे हुए हाथियों को देखकर अचानक रूक गया। उसने देखा कि हाथियों कि अगले पैर में एक रस्सी बँधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ कि हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोट सी रस्सी से बँधे हैं।


ये तो स्पष्ट था कि हाथी उस रस्सी को आराम से तोड़ सकते थे, पर किसी वजह से वे ऐसा नहीं कर सकते हैं।
उसने पास खड़े महावत से पूछा कि ये हाथी क्यों इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास भी नहीं कर रहे हैं। तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों में बाँधा जाता है। उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस रस्सी को तोड़ सकें।

बार-बार कोशिश करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों को तोड़ नहीं सकते हैं, और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिये वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ह नहीं करते।”


आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिये रस्सी में बँधे रह सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं।


इन हाथियों की तरह हममें से कितने लोग मात्र पहले से मिली आलसता के कारण यह मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम नहीं हो सकता है और अपनी ही बनायी हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े हुए पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। याद रखिये असफलता जीवन का मात्र एक हिस्सा है ,और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है।

ज्ञान - Short Moral Stories in Hindi

एक शिष्य गुरू के पास आया। शिष्य पंडित था और मशहूर भी, गुरू से भी ज्यादा। सारे शास्त्र उसे कंठस्थ थे।
समस्या यह थी कि सभी शास्त्र कंठस्थ होने के बाद भी वह सत्य की खोज नहीं कर सका था। ऐसे में जीवन
के अंतिम क्षणों में उसने गुरू की तलाश शुरू की।संयोग से गुरू मिल गए। वह उनकी शरण में पहुँचा।


गुरू ने पंडित की तरफ देखा और कहा, ‘तुम लिख लाओ कि तुम क्या-क्या जानते हो। तुम जो जानते हो,
फिर उसकी क्या बात करनी है। तुम जो नहीं जानते हो, वह तुम्हें बता दूंगा।

शिष्य को वापस आने में सालभर लग गया, क्योंकि उसे तो बहुत शास्त्र याद थे। वह सब लिखता ही रहा, लिखता ही रहा। कई हजार पृष्ठ भर गए। पोथी लेकर आया।

गुरू ने फिर कहा, ‘यह बहुत ज्यादा है। मैं बूढ़ा हो गया। मेरी मृत्यु करीब है। इतना न पढ़ सकूंगा। तुम इसे संक्षिप्त कर लाओ, सार लिख लाओ।‘


पंडित फिर चला गया। तीन महीने लग गए। अब केवल सौ पृष्ठ थे। गुरू ने कहा, मैं ‘यह भी ज्यादा है। इसे
और संक्षिप्त कर लाओ।

कुछ समय बाद शिष्य लौटा। एक ही पन्ने पर सार-सूत्र लिख लाया था, लेकिन गुरू बिल्कुल मरने के करीब थे। कहा, ‘तुम्हारे लिए ही रूका हूँ। तुम्हें समझ कब आएगी? और संक्षिप्त कर लाओ।


शिष्य को होश आया। भागा दूसरे कमरे से एक खाली कागज ले आया। गुरू के हाथ में खाली कागज दिया।
गुरू ने कहा, ‘अब तुम शिष्य हुए। मुझसे तुम्हारा संबंध बना रहेगा।‘ कोरा कागज लाने का अर्थ हुआ, मुझे कुछ
भी पता नहीं, मैं अज्ञानी हूँ। जो ऐसे भाव रख सके गुरू के पास आता है, वही शिष्य है।

सीख
गुरू तो ज्ञान-प्राप्ति का प्रमुख स्त्रोत है, उसे अज्ञानी बनकर ही हासिल किया जा सकता है। पंडित बनने से गुरू नहीं मिलते।

बातूनी कछुआ

एक समय कंबुग्रीव नामक बातूनी कछुआ एक झील के पास रहता था। दो सारस पक्षी जो उसके दोस्त थे उसके साथ झील में रहते थे। एक बार गर्मियों में, झील सूखने लगी, और उसमें जानवरों के लिए थोड़ा सा पानी बचा था।

सारस ने कछुए को बताया कि दूसरे वन में एक दूसरी झील है जहाँ बहुत पानी है, उन्हें जीवित रहने के लिए वहां जाना चाहिए। लेकिन कछुवा चिंतित हो गया और रोने लगा कि वह दुसरी झील नहीं जा पायेगा क्योंकि वह बहुत दूर है।

ऐसे में दोनों सारसों ने एक योजना बनायी। वे योजना के अनुसार कछुए के साथ वहां से ले जाने के लिए तैयार हुए। उन्होंने एक छड़ी को लिया और कछुए को बीच में मुँह से पकड़कर रखने को कहा और कहा कि अपने मुंह को खोलना नहीं,चाहे कोई भी बात हो। कछुआ उनकी बात मान गया।

कछुए ने छड़ी के बीच को अपने दांतों से पकड़ा और दोनों सारसों ने छड़ी के दोनों कोने को अपने चोंच से पकड़ लिया। रास्ते में गांवों के लोग कछुए को उड़ते हुए देख रहे थे और बहुत आश्चर्यचकित थे। उन दो पक्षियों के बारे में जमीन पर एक हंगामा सा मच गया था जो एक छड़ी की मदद से कछुए को ले जा रहे थे।

सरसों की चेतावनी के बावजूद, कछुआ ने अपना मुंह खोला और कहा: “यह सब क्या हंगामा क्यों हो रहा है?” ऐसा कहते ही वह नीचे गिर गया और उसकी मौत ही गई।

सीख-
जितना आवश्यकता हो उतना ही बोलना चाहिए। बेकार की बात ज्यादा करने से हानि स्वयं को ही होती है।

बंदर और मगरमच्छ

एक नदी के किनारे एक जामुन के पेड़ पर एक बन्दर रहता था जिसकी मित्रता उस नदी में रहने वाले मगरमच्छ के साथ हो गयी।वह बन्दर उस मगरमच्छ को भी खाने के लिए जामुन देता रहता था।

एकदिन उस मगरमच्छ ने कुछ जामुन अपनी पत्नी को भी खिलाये। स्वादिष्ट जामुन खाने के बाद उसने यह सोचकर कि रोज़ाना ऐसे मीठे फल खाने वाले का दिल भी खूब मीठा होगा ;अपने पति से उस बन्दर का दिल लाने की ज़िद्द की।

पत्नी के हाथों मजबूर हुए मगरमच्छ ने भी एक चाल चली और बन्दर से कहा कि उसकी भाभी उसे मिलना चाहती है इसलिए वह उसकी पीठ पर बैठ जाये ताकि सुरक्षित उसके घर पहुँच जाए।बन्दर भी अपने मित्र की बात का भरोसा कर, पेड़ से नदी में कूदा और उसकी पीठ पर सवार हो गया।

जब वे नदी के बीचों-बीच पहुँचे ; मगरमच्छ ने सोचा कि अब बन्दर को सही बात बताने में कोई हानि नहीं और उसने भेद खोल दिया कि उसकी पत्नी उसका दिल खाना चाहती है।

बन्दर को धक्का तो लगा लेकिन उसने अपना धैर्य नहीं खोया और तपाक से बोला –‘ओह, तुमने, यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई क्योंकि मैंने तो अपना दिल जामुन के पेड़ की खोखल में सम्भाल कर रखा है।अब जल्दी से मुझे वापस नदी के किनारे ले चलो ताकि मैं अपना दिल लाकर अपनी भाभी को उपहार में देकर; उसे खुश कर सकूँ।

मूर्ख मगरमच्छ बन्दर को जैसे ही नदी-किनारे ले कर आया ;बन्दर ने ज़ोर से जामुन के पेड़ पर छलांग लगाई और क्रोध में भरकर बोला –“अरे मूर्ख ,दिल के बिना भी क्या कोई ज़िन्दा रह सकता है ? जा, आज से तेरी-मेरी दोस्ती समाप्त।”

मित्रों ,बचपन में पढ़ी यह कहानी आज भी मुसीबत के क्षणों में धैर्य रखने की प्रेरणा देती है ताकि हम कठिन समय का डट कर मुकाबला कर सकें। दूसरी बात यह कि मित्रता का हमेशा सम्मान करना चाहिये ।

डरपोक खरगोश

तुम जानते होगे कि ख़रगोश बड़े ही डरपोक होते हैं। एक खरगोश को अपनी डरने की आदत बहुत बुरी लगती थी। वह सोचा करता था- ‘हे भगवान, आपने मुझे इतना डरपोक क्यों बनाया। ज़रा-सी आवाज़ हुई कि मैं डर जाता हूं। कोई प्यार करने के लिए भी हाथ बढ़ाए तो भी मैं डरकर छिप जाता हूं। क्यों हूं मैं इतना डरपोक? आखिर क्यों?‘


उसने सोचा कि अब वह डरेगा नहीं। उसने अपने-आपसे कहा, ‘मैं बहादुर हूं। मैं डरपोक नहीं हूं।‘ तभी एक हल्की-सी आवाज़ हुई और खरगोश डरकर भागने लगा। क्योंकि आदत इतनी जल्दी ही न बदलती है।


दौड़ते-दौड़ते वह एक तालाब के किनारे पहुंचा। वहाँ कुछ मेढ़क खेल रहे थे। जैसे ही उन्होंने किसी के आने की आवाज़ सुनी, वे डरकर तुरंत पानी में कूद गए।

खरगोश को तसल्ली हुई। उसने सोचा, ‘चलो कोई तो है जो मुझसे भी डरता है। इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया में सब किसी-न-किसी से डरते हैं और जो सबसे ज्यादा ताकतवर है, वह भी ईश्वर से डरता है। इसलिए अपने से ज्यादा ताकतवर जीव से डरना और सावधान रहना बुरी बात नहीं है।

कछुआ और गिलहरी

एक तालाब के किनारे जामुन का एक पेड़ था उस पेड़ के छोटे से कोटर में एक गिलहरी रहती थी। सुबह होते ही वह अपने बच्चों के साथ कोटर से बाहर आ जाती और जो भी मिलता, उसको अपने बच्चों के साथ बड़े चाव से खाती थी। उसी तालाब में एक कछुआ बहुत दिनों से रहता था। उसका भी अपना पूरा परिवार था।

वह कछुआ बहुत मोटा और भारी था। जैसे मोटा उसका शरीर था वैसे ही उसकी बुद्धि भी मोटी थी। गिलहरी और कछुए में घनिष्ठ मित्रता थी। आषाढ़ के महीने में जामुन पकने लगे तो कछुए का मन ललचा गया। उसने गिलहरी से कहा:-” क्या तुम मुझे दोस्ती की खातिर जामुन भी नहीं खिला सकती?”

गिलहरी उसकी मीठी-मीठी बातों में आ गई और पके जामुन कछुए को देने लगी। कछुआ जामुन खाता और कुछ अपने बच्चों के लिए ले जाता। कछुवी इन जामुनों को पाकर बड़ी खुश हो जाती और गिलहरी के स्वभाव की प्रशंसा करती।

एक दिन कछुवी ने गिलहरी को तेजी से भागते हुए पेड़ पर चढ़ते हुए देखा। उसकी नजर लहराती पूँछ और धारीदार कमर पर पड़ी तो देखकर आश्चर्य में पड़ गई।

कछुवी ने कछुए से कहा:-” तालाब के राजा! मैं आपकी पत्नी हूँ, मेरी इच्छा है कि मैं भी इस गिलहरी की तरह दौड़ पाती।“

मुझे लगता है कि यदि मैं इस गिलहरी को मारकर खा जाऊँ तो उसके सारे गुण मुझ में आ सकते हैं। आप किसी तरह अपनी दोस्त को यहां तक ले आओ।”

कछुए ने कहा:-” यह काम जरा भी मुश्किल नहीं है। वह मुझ पर इतना विश्वास करती है कि मेरे साथ चली आएगी| तुम्हारी इच्छा तो पूरी करनी ही पड़ेगी।”

कछुआ जामुन खाने के बहाने गिलहरी के पास गया और बोला:-” आज कल वर्षा के कारण तालाब खूब भर गया है। हमारे परिवार के लोग चाहते हैं कि तुम्हें तालाब की सैर करा दी जाए।” गिलहरी उसकी बातों में आ गई।

उसने कछुए की पीठ पर बैठकर तालाब की सैर करने की बात मान ली। दोनों तालाब के बीच में जा पहुंचे।

जब कछुए ने समझ लिया कि गिलहरी यहां से भाग नहीं सकती तो उसने गिलहरी से कहा:-” मुझे अफसोस है कि आज मैं तुम्हें मारकर तुम्हारा मांस अपनी पत्नी को खिलाऊंगा।”

गिलहरी ने बिना घबराए पूछा:-” परंतु क्यों?” कछुए ने कहा:-” क्योंकि मेरी पत्नी बहुत धीरे-धीरे चलती है और उसको किसी ने कहा है कि यदि वह तुम्हारा मांस खा ले तो वह भी तुम्हारी तरह दौड़ सकती है।”

‘ओह तो यह बात है’| गिलहरी ने चालाकी से हंसते हुए कहा:-” मेरे मित्र! जरा सी बात को तुम कितना तूल दे रहे हो।

अरे, मेरे कोटर में एक गरुड पंख रखा हुआ है| जो भी उस पंख को छू लेता है वह भी मेरी तरह दौड़ सकता है।

यदि तुम मुझे पहले कहते, तो मैं वह पंख तुम्हें दे देती| लेकिन कोई बात नहीं है मैं अभी तुम्हें वह पंख देती हूं।”

मूर्ख कछुआ गिलहरी के झांसे में आ गया और वह वापस जामुन के पेड़ की ओर चल पड़ा| किनारे के पास पहुंचते ही गिलहरी कूद कर पेड़ पर जा चढ़ी और बोली:-” दुष्ट कछुए, जाओ और फिर कभी वापस लौटकर मत आना| ”

बेचारा कछुआ हाथ मलते रह गया और निराश होकर तालाब के पानी में चला गया।

सीख- मुश्किल समय में घबराने के बजाय सूझ-बूझ से काम करना चाहिये।

पैसों का पेड़

एक गरीब लकड़हारा लकड़ियाँ काटकर अपने घर जा रहा था। रास्ते में उसे एक साधु बाबा मिले। सर्दियों के दिन थे। साधु बाबा ठंड से ठिठुर रहे थे। लकड़हारे ने कुछ लकड़ियाँ साधु बाबा के पास जला दीं।

उन्हें बहुत आराम मिला। खुश होकर उन्होंने जकड़हारे को एक अँगूठी दी। उन्होंने लकड़हारे को बताया कि यदि वह इस अँगूठी को पहनकर मंत्र पढ़ेगा तो उसके सामने पैसों का एक पेड़ उग आएगा। फिर वह जितने चाहे उतने पैसे तोड़ सकता है। उन्होंने लकड़हारे को एक मंत्र भी बताया। पेड़ उगाने के लिए यह मंत्र पढ़ना ज़रूरी था।


लकड़हारे ने साधु बाबा को धन्यवाद दिया और अपने घर आ गया। उसने अपनी पत्नी को अँगूठी दिखाई। वह भी बहुत खुश हुई। अब उन्हें जब भी पैसों की ज़रूरत होती थी, वे दोनों पैसों का पेड़ उगा लेते थे।

एक दिन उनके एक पड़ोसी ने उन्हें ऐसा करते हुए देख लिया। उसे लालच आ गया। एक रात उसने वह अँगूठी चुरा ली। उसने अँगूठी को पहन लिया और पैसों का पेड़ उगने का इंतजार करने लगा। लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। उसे पता ही नहीं था कि पेड़ उगाने के लिए मंत्र भी पढ़ना पड़ता है।

उधर लकड़हारा परेशान था। उसने पूरे घर में अँगूठी दूँढ़ी, लेकिन उसे कहीं भी अँगूठी नहीं मिली। वह परेशान होकर साधु बाबा के पास पहुँचा। साधु बाबा ने अपनी शक्ति से चोर का पता लगा लिया। अँगूठी उस लालची पड़ोसी के पास ही थी।


साधु बाबा ने उससे अँगूठी ले ली। उसे पुलिस ने पकड़ लिया और कड़ी सज़ा दी। इसीलिए कहते हैं कि चोरी करना बुरी बात है।

सीख- चोरी करना बुरी बात है।

नन्हीं चिड़िया

बहुत पुरानी बात है, एक बहुत घना जंगल हुआ करता था। एक बार किन्हीं कारणों से पूरे जंगल में भीषण आग लग गयी। सभी जानवर देख के डर रहे थे की अब क्या होगा?

थोड़ी ही देर में जंगल में भगदड़ मच गयी सभी जानवर इधर से उधर भाग रहे थे पूरा जंगल अपनी-अपनी जान बचाने में लगा हुआ था। उस जंगल में एक नन्हीं चिड़िया रहा करती थी। उसने देखा कि सभी लोग भयभीत हैं। जंगल में आग लगी है, उसने सोचा मुझे लोगों की मदद करनी चाहिए।

यही सोचकर वह जल्दी ही पास की नदी में गयी और चोच में पानी भरकर लाई और आग में डालने लगी। वह बार-बार नदी में जाती और चोच में पानी डालती। पास से ही एक उल्लू गुजर रहा था उसने चिड़िया की इस हरकत को देखा और मन ही मन सोचने लगा बोला कि ये चिड़िया कितनी मूर्ख है इतनी भीषण आग को ये चोंच में पानी भरकर कैसे बुझा सकती है।

यही सोचकर वह चिड़िया के पास गया और बोला कि तुम मूर्ख हो इस तरह से आग नहीं बुझाई जा सकती है।
चिड़िया ने बहुत विनम्रता के साथ उत्तर दिया – ‘मुझे पता है कि मेरे प्रयास से कुछ नहीं होगा लेकिन मुझे अपनी तरफ से अच्छा करना है, आग कितनी भी भयंकर हो लेकिन मैं अपना प्रयास नहीं छोडूंगी।‘
उल्लू यह सुनकर बहुत प्रभावित हुआ।

सीख- परेशानी आने पर डरे नहीं, बिना घबराये प्रयास करते रहे।

महात्मा और खज़ूर

एक बार एक महात्मा बाजार से होकर गुजर रहे थे। रास्ते में एक व्यक्ति खजूर बेच रहा था। उस महात्मा के मन में विचार आया कि खजूर लेनी चाहिए। उन्होंने अपने मन को समझाया और वहां से चल दिए। किंतु महात्मा पूरी रात भर सो नहीं पाए।

अगले दिन वह विवश होकर जंगल में गए और जितना बड़ा लकड़ी का गट्ठर उठा सकते थे, उन्होंने उठा लिया। उस महात्मा ने अपने मन से कहा कि यदि तुझे खजूर खानी है, तो यह बोझ उठाना ही पड़ेगा। महात्मा,थोड़ी दूर ही चलते, फिर गिर पड़ते, फिर चलते और गिरते।| उनमें एक गट्ठर उठाने की हिम्मत नहीं थी लेकिन उन्होंने लकड़ी के भारी भारी दो गट्ठर उठा रखे थे|

दो ढाई मील की यात्रा पूरी करके वह शहर पहुंचे और उन लकड़ियों को बेचकर जो पैसे मिला उससे खजूर खरीदने के लिए बाजार की ओर चल दिये। खजूर वाले को सामने देखकर महात्मा का मन बड़ा प्रसन्न हुए|

महात्मा ने उन पैसों से खजूर खरीदें लेकिन महात्मा ने अपने मन से कहा कि आज तूने खजूर मांगी है, कल फिर कोई और इच्छा करेगी। कल अच्छे-अच्छे कपड़े और स्त्री मांगेगा अगर स्त्री आई तो बाल बच्चे भी होंगे। तब तो मैं पूरी तरह से तेरा गुलाम ही हो जाऊंगा।

सामने से एक मुसाफिर आ रहा था। महात्मा ने उस मुसाफिर को बुलाकर सारी खजूर उस आदमी को दे दी और खुद को मन का गुलाम बनने से बचा लिया।

सीख:-

यदि मन की सुनोगे तो मन के गुलाम बन जाओगे। मन की बात सुनना अच्छी बात है लेकिन अति सर्वथा घातक होती है।

दोस्त की मदद

किसी तालाब में एक कछुआ रहता था। तालाब के पास माँद में रहने वाली एक लोमड़ी से उसकी दोस्ती हो गई। एक दिन वे तालाब के किनारे गपशप कर रहे थे कि एक तेंदुआ वहाँ आया। दोनों अपने-अपने घर की ओर जान बचाकर भागे। लोमड़ी तो सरपट दौड़कर अपनी माँद में पहुँच गई लेकिन कछुआ अपनी धीमी चाल के कारण तालाब तक नहीं पहुँच सका। तेंदुआ एक छलाँग में ही उस तक पहुँच गया।

कछुए को कहीं छुपने का भी मौका न मिला। तेंदुए ने कछुए को मुँह में पकड़ा और उसे खाने के लिए एक पेड़ के नीचे चला गया। लेकिन दाँतों और नाखूनों का पूरा जोर लगाने पर भी कछुए के सख्त खोल पर खरोंच तक नहीं आई। लोमड़ी अपनी माँद से यह देख रही थी।

उसने कछुए को बचाने की तरकीब सोची। उसने माँद से झाँककर बाहर देखा और भोलेपन के साथ बोली- तेंदुए जी, कछुए के खोल को तोड़ने का मैं आसान तरीका बताती हूँ। इसे पानी में फेंक दो। थोड़ी देर में पानी से इसका खोल नरम हो जाएगा। चाहो तो आजमाकर देख लो।

तेंदुए ने कहा- ठीक है, अभी देख लेता हूँ। यह कहकर उसने कछु ए को पानी में पेंफक दिया।बस फिर क्या था,गया कछुआ पानी में।

सीख- मुसीबत में मित्र की मदद करनी चाहिये।

 

बादशाह की ढाढ़ी

बादशाह कासिम अपनी प्रजा की हिफाजत के लिए रात को भेष बदलकर अपने राज्य में घूमता था। एक बार रात में घूमने के दौरान बादशाह कासिम को पाँच चोर मिले।

बादशाह ने उनसे पूछा:- “आप कौन हैं?” उन्होंने जवाब दिया:- “हम चोर हैं।” फिर एक चोर ने बादशाह से पूछा कि “आप कौन हैं?” बादशाह ने कहा:-” मैं भी चोर हूं।”

इस पर चोरों ने बादशाह को अपने गिरोह में शामिल कर लिया। अब चोरी करने की सलाह हुई, लेकिन चोरी करने से पहले यह तय हुआ कि उन्हें अपने में से किसी एक को सरदार बनाना चाहिए। इस बात पर सभी चोर सहमत हो गए। सरदार चुने जाने के लिये यह तय हुआ कि सब अपना-अपना गुण बताएँ, ताकि जिसका गुण सबसे अच्छा हो उसे ही सरदार चुना जाए।

पहले चोर ने कहा कि मैं ऐसी रस्सी का ऐसा फंदा लगाता हूं कि एक बार में ही रस्सी फंस जाती है। दूसरे ने कहा,” मैं सेंध लगाना बहुत अच्छी तरह से जानता हूं।”

तीसरे चोर ने कहा कि “मैं सूंघकर बता सकता हूं कि माल कहां पर दबा हुआ है।”

चौथे ने कहा कि मैं जानवरों की बोली समझ सकता हूं कि वह क्या कहते हैं।

पांचवें चोर ने कहा कि मैं जिसको रात में एक बार देख लेता हूं, दिन में भी उसकी पहचान कर लेता हूं।

बादशाह सोच रहा था कि मैं क्या कहूँ? जब सारे चोर अपना अपना गुण बयान कर चुके, तब बादशाह ने कहा कि मेरी दाढ़ी में यह कमाल है कि चाहे कितने भी बड़े अपराध करने वाले चोर-डाकू फांसी पर चढ़ रहे हो, यदि मैं जरा सी दाढ़ी हिला दूं तो सब आजाद हो जाते हैं।

चोरों ने जब बादशाह का यह गुण सुना तो उनको यह गुण सबसे अच्छा लगा। उन्होंने बादशाह को ही अपना सरदार बना लिया। पास में ही उस बादशाह का महल था। उन चारों में यह सलाह हुई कि आज बादशाह के महल में चोरी करेंगे। बादशाह भी मजबूर था। जब वह सारे चोर महल की ओर चलने लगे तो रास्ते में एक कुत्ता भौंकने लगा।

चोरों ने चौथे चोर से पूछा कि यह क्या कहता है? उस चोर ने कहा कि यह कुत्ता कहता है कि हम में से एक बादशाह है। यह सुनकर सब जोर जोर से हंस पड़े, बादशाह भी हंस पड़ा।

महल में पहुंचकर पहले चोर ने फंदा लगाया। सारे चोर और बादशाह ऊपर चढ़ गए। दूसरे चोर ने सेंध लगाई तीसरे चोर ने सूंघकर खजाने का पता लगाया और चोरी करने के बाद सभी चोरों ने माल आपस में बाँट लिया और अपने अपने घरों को चल दिए।

अगले दिन बादशाह ने अपने आदमी भेजकर चोरों को पकड़वा लिया और फाँसी का हुक्म दे दिया। जब फाँसी लगने लगी तो पाँचवा चोर सामने आया और बादशाह से कहने लगा:-” हुजूर! मैंने आपको पहचान लिया है, “आप ही रात को हमारे साथ थे। हम पर रहम करो और हमें फांसी से बचा लो। हम सच्चे दिल से संकल्प लेते हैं कि आज से कभी भी चोरी नहीं करेंगे बल्कि आपकी सेवा में सारी उम्र लगा देंगे।”

बादशाह ने अपनी दाढ़ी हिला दी और बादशाह के दाढ़ी हिलाते ही पाँचो चोर फांसी के तख्ते से उतार लिए गए| वे पाँचों चोर हमेशा के लिए आजाद होकर बादशाह की सेवा में लग गए।

सीख:-
ईश्वर भी किसी न किसी रूप में आकर हमें हमेशा सीधे रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करता है|

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